ग्रामीण कार्यषील महिलाओं के स्वास्थ्य पर आवासीय दशाओं का प्रभाव, (पूर्वी षिवनाथ बेसिन के विषेष संदर्भ में)

 

सेवन कुमार भारती1, ओमकुमारी वर्मा2,

1सहायक प्राध्यापक भूगोल, शासकीय महाविद्यालय प्रेमनगर जिला सूरजपुर ..

2रिसर्च एसोसिएट, भूगोल अध्ययन शाला, पं.रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर ..

*Corresponding Author E-mail:  

 

सारांश-

आवास एक मूलभूत आवश्यकता है। परन्तु देश के एक बड़े जनसंख्या को सुविधा युक्त आवास उपलब्ध नहीं हो पाया है। छत्तीसगढ़ में ग्रामीण क्षेत्र की स्थिति और भी दयनीय है यहां 80 प्रतिशत जनसंख्या के पास संतुलित, सुविधा युक्त, वातावरणीय, गुणवत्तायुक्त आवास की कमी है। जनसंख्या में प्रतिवर्ष वृद्धि हो रही है उस अनुपात में आवास का निर्माण नहीं हो पा रहा है। फलस्वरूप जनसंख्या एवं आवासीय स्थिति का अनुपात असंतुलित हो रहा है। अत्यधिक भीड़ एवं एकान्तता के अभाव के कारण निवासियों में भावनात्मक एवं मानसिक अषान्ति उत्पन्न हो रही है और रोगग्रस्त होते जा रहे है। शासन द्वारा इस समस्याओं को दूर करने के लिए विभिन्न प्रकार के योजना का  क्रियान्वयन किया जा रहा है तथापि अभी भी इस दिशा में ठोस उपलब्धि हासिल नहीं हुआ है जो ग्रामीण नियोजन एवं विकास के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां प्रस्तुत करती है।

 

मूल शब्द- आवास, आवासीय स्तर, स्वास्थ्य, आर्थिक विकास।

 


INTRODUCTION:

किसी क्षेत्र के पारिवारिक परिवेष के निर्धारण में आवासीय दषाओं का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि यह परिवार के सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सूचक होता है। आवासीय स्थिति से तात्पर्य आवास मंे उपलब्ध सुविधाओं जैसे-षौचालय, स्नानागार, पेयजल, रोषनदान, बरामदा, खिड़की, गंदे पानी निकासी की व्यवस्था तथा जानवर का अलग से रहने का स्थान आदि से है। 

 

सुविधा युक्त, आवास मंें व्यक्तियों का स्वास्थ्य अच्छा होता है। स्वास्थ्य, जीवन शैली, व्यक्ति के मानसिक कार्यक्षमता, तंदरूस्ती तथा उत्पादकता को निर्धारित करता है। स्वास्थ्य, व्यक्तियों के विचारसीमा को बढ़ाता है तथा सोचने की शक्ति प्रदान कर आंनदमय, सुखद, स्वास्थ्यवर्धक जीवन को पोषित करता है। अतः आवासीय स्थिति, किसी भी जनसमुदाय के स्वास्थ्य एवं जीवन की गुणवत्ता के निर्धारण की महत्वपूर्ण इकाई है। चैबे के अनुसार (2012) आवास वह आधारभूत भौतिक-संरचना है, जिसमंे मनुष्य की विषेष आर्थिक क्रियाएँ संपन्न होती है तथा विषिष्ट प्रकार का सामाजिक स्वरूप विकसित होता है। आवास, मानव निर्मित महत्वपूर्ण वातावरणीय कारक है जो व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं रोग की तीव्रता को प्रभावित करता हैै। तथापि आवासीय स्थिति केवल जीवन शैली की गुणवत्ता को निर्धारित करती है, बल्कि स्वास्थ्य स्तर को संतुलित भी बनाए रखती है

 

ग्रामीण क्षेत्र में कच्चे मकान की अधिकता होती है तथा आवासीय सुविधाओं का सर्वथा अभाव होता है इसे निम्न स्तरीय आवास कहा जाता है। इस निम्न स्तरीय आवासीय दषाओं एवं आवष्यक आवासीय सुविधाओं के वंचन का सबसे अधिक प्रभाव स्त्रियों तथा बच्चांे पर पड़ता है, क्योंकि इनका अधिकांष समय आवास में व्यतीत होता है। ग्रामीण अधिवास के अत्यधिक भीड़युक्त एवं निम्न आवासीय सुविधाओं के कारण महिलाओं में मानसिक अषांति उत्पन्न हो जाती है तथा वे रोगग्रस्त हो जाती है। इस अस्वस्थकर एवं निम्न स्तरीय आवासीय सुविधाओं का प्रभाव, महिला के कार्यक्षमता, प्रजननतंत्र, बच्चों के पालन-पोषण, व्यक्तित्व तथा सामाजिक प्रतिष्ठा पर भी पड़ता है। आवास, महिलाओं की पूर्ण भौतिक एवं मनोवैज्ञानिक आवष्यकता है जो उन्हें मौसम, जलवायु तथा व्यक्तिगत विचारों की गोपनीयता एवं एकांतता आदि को सुरक्षा प्रदान करता है। साथ ही यह महिलाओं की एक संपूर्ण सामाजिक जरूरत भी है जो क्षेत्र विषेष को जोड़ने एवं संचारों के आदान-प्रदान वाले भौगोलिक परिवेष का एक महत्वपूर्ण आधारी ईकाई का कार्य करता है। ओकेलो (2007) के अनुसार आवास महिलाओं को जमीनी हक प्रदान कर प्रतिरोधी शक्ति को दूर करता है तथा महिलाओं को बचत प्रबंध का गुर सिखाता तथा महिलाओं में समझ एवं व्यक्तित्व प्रदान करता है। इस प्रकार आवासीय दषाएँ महिलाओं के जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित करती है।

 

अध्ययन क्षेत्र की आवासीय दषाएँ:

पूर्वी षिवनाथ बेसिन में 68.11 प्रतिषत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्र में निवास करते हंै ग्रामीण क्षेत्र की अधिकांष आवास निजी, छोटे एवं मिटटी के बने हैं जिसमें गामीण, नागरिक सुविधाओं के आभाव में अपना जीवन यापन करते हंै। ग्रामीण बस्तियों में 75 प्रतिषत परिवार एक या दो कमरे में जिसमें औसतन 5-7 व्यक्ति निवास करते है, में रहकर अपना जीवन का अधिकांष भाग गुजार रहे हंै। बेसिन के ग्रामीण परिवारों में 80 प्रतिषत से अधिक परिवरों के पास निजी पेयजल, शौचालय की व्यवस्था एवं स्नानागार की व्यवस्था नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र में गंदे जल के निकास एवं परिष्कृत पेयजल की सुविधाओं का अत्यंत अभाव है। सड़क के किनारे एवं गांव के चारों ओर कचरे के ढेर तथा मल विसर्जन, निस्तारण के आभाव में दुर्गन्धयुक्त पड़े रहते हंै जो विषैले कीडं़े मकोड़, मच्छर एवं मक्खियों को आकर्षित करते हैं कुमारा (1982) इन सबका प्रभाव ग्रामीण व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव महिलाओं के व्यक्तित्व एवं उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए शोध अध्ययन के लिए इस विषयवस्तु का चयन किया गया है।

 

उद्देष्य:

प्रस्तुत शोध पत्र का प्रमुख्य उद्देष्य-

1. बेसिन की ग्रामीण कार्यषील महिलाओं की आवासीय दषाओं का अध्ययन करना।

2. बेसिन के निम्न स्तरीय ग्रामीण आवासीय दषाओं एवं उनसे उत्पन्न होने वाले समस्याओं का विष्लेषण करना।

3. बेसिन के ग्रामीण कार्यषील महिलाओं की आवष्यक आवासीय सुविधाओं के अभाव के कारण महिलाओं के स्वास्थ्य एवं जीवन की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभावों का विष्लेषण करना प्रमुख है।

 

विधितंत्र     

प्रस्तुत शोध पत्र मुख्यतः प्राथमिक आंकड़ों पर आधारित है। इनमें ग्रामीण कार्यषील महिलाओं की आवासीय दषाओं एवं समस्याओं से संबंधी आंकड़ंें प्रमुख है। पूर्वी षिवनाथ बेसिन, बारह विकासखंडों में विभक्त है अतः अध्ययन संबंधी प्राथमिक आंकड़ों के संकलन के लिए सर्वप्रथम प्रत्येक विकासखण्ड से एक-एक गांव का दैव निदर्षन विधि द्वारा चयन किया गया। चयनित गांव से 50 प्रतिषत ग्रामीण कार्यषील महिलाओं का चयन कर उनके आवासीय दशाओं का अध्ययन किया गया। इस प्रकार समग्र बेसिन से 1380 ग्रामीण कार्यषील महिलाएं चयनित हुई जिनकी आवासीय दषाओं की जानकारी प्राप्त करने के लिए साक्षात्कार अनुसूची प्रयुक्त किया गया।

 

बेसिन में ग्रामीण कार्यषील महिलाओं के आवासीय दषाओं के अंतर्गत मकान का प्रकार, मकान का क्षेत्रफल एवं दषा, दीवाल का प्रकार, छत का प्रकार, फर्ष का प्रकार, कमरों की संख्या एवं दषा, बिजली की व्यवस्था, शौचालय की व्यवस्था तथा पीने के पानी का स्रोत आदि का भौगोलिक विष्लेषण किया गया है। आवासीय दषा में मकान का क्षेत्रफल एवं कमरों की संख्या तथा परिवार की संख्या के अनुपात ज्ञात करने के लिए भारतीय मानक ब्यूरों के मानकों का प्रयोग किया गया एवं ग्रामीण कार्यषील महिलाओं में स्वास्थ्य दषा एवं स्तर का परिकलन मानवमितिय अध्ययन, रोग एवं बीमारी तथा स्वास्थ्य सेवाऐं एवं सुविधाओं के आधार पर किया गया।

 

अध्ययन क्षेत्र:

भौगोलिक पृष्ठभूमि के दृष्टि से पूर्वी षिवनाथ बेसिन, छत्तीसगढ़ प्रदेष के (20ह्23ष् से 22ह्02ष् उत्तरी अक्षांष तथा 80ह्46ष् से 81ह्58ष् पूर्वी देषान्तर के) मध्य विस्तृत है। प्रषासनिक दृष्टि से बेसिन, उत्तर में जिला मुंगेली, पूर्व में रायपुर, दक्षिण में कांकेर, पष्चिम में राजनांदगाव, उत्तर-पष्चिम में कवर्धा, उत्तर-पूर्व में बलौदाबाजार तथा दक्षिण-पूर्व में धमतरी जिला से परिसिमित है। बेसिन का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 8718.13 वर्ग किलोमीटर है, जो छत्तीसगढ़ राज्य का 6.45 है। यह छत्तीसगढ़ प्रदेष का सबसे विकसित औद्योगिक एवं कृषि प्रधान क्षेत्र है। बेसिन का दुर्ग-भिलाई औद्योगिक क्षेत्र, प्रदेष में अव्वल है जिसका प्रभाव चतुर्थिक समीपवर्ती क्षेत्र में दिखाई पड़ता है परन्तु दूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्र में इसका प्रभाव नगण्य है फलस्परूप ग्रामीण क्षेत्र में आवष्यक आवासीय सुविधाओं जैसे- शौचालय, शुद्धजल एवं वातावरणीय विद्युत सुविधाओं का अभाव है जो ग्रामीण विकास के लिए महत्वपूर्ण चुनौती प्रस्तुत करती है जिसका निराकरण आवष्यमभावी है।

 

 

ग्रामीण कार्यषील महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक संरचना:

ग्रामीण क्षेत्र सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से काफी पिछड़े होते हैं। विषेषकर ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता दर निम्न स्तर के होते हंै। निम्न शैक्षणिक स्थिति के कारण आर्थिक पिछड़ेपन की दषा मिलती है (पंडा एवं वर्मा, 2015) इसका प्रत्यक्ष प्रभाव ग्रामीण महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक विकास पर पड़ता है। इससे उनकी जीवन की गुणवत्ता एवं स्वास्थ्य दोनों प्रभावित होती है।

 

बेसिन में चयनित परिवारों की कुल जनसंख्या 6288 है इसमें 3114 महिलाएँ है जो कुल जनसंख्या का  49.52 प्रतिषत है। चयनित कुल ग्रामीण महिलाओं (1380) में से 44.40 प्रतिषत महिलाएं कार्यषील हंै। चयनित कार्यषील महिलाओं में 10.51 प्रतिषत हल्के कार्य में एवं 89.49 प्रतिषत महिलाएँ भारी कार्य में संलग्न है। कार्यषील महिलाओं में 28.18 प्रतिषत युवावर्ग, 71.60 प्रतिषत प्रौढ़वर्ग तथा 0.22 प्रतिषत महिलाएँ वृद्धवर्ग से है। कार्यषील महिलाओं में सबसे अधिक विवाहित महिलाएँ 98.77 प्रतिषत है, जबकि मात्र 1.23 प्रतिषत महिलाएँ अविवाहित है। कार्यषील महिलाओं में 58.62 प्रतिषत षिक्षित तथा 41.38 प्रतिषत महिलाएँ अषिक्षित है। कुल शिक्षित कार्यषील महिलाओं में 13.55 प्रतिषत महिलाएँ मात्रसाक्षर है, जबकि 19.57 प्रतिषत प्राथमिक स्तर, 15.80 प्रतिषत माध्यमिक स्तर, 8.04 प्रतिषत उच्च एवं उच्चत्तर माध्यमिक स्तर तथा मात्र 1.66 प्रतिषत महिलाएँ महाविद्यालीन स्तर तक षिक्षित है। चयनित ग्रामीण कार्यषील महिलाओं में 25.58 प्रतिषत भूमिहीन, 43.42 प्रतिषत सीमांत कृषक, 18.55 प्रतिषत लघु कृषक, 8.62 प्रतिषत अर्धमध्यम, 3.11 प्रतिषत मध्यम  तथा 0.72 प्रतिषत महिलाएँं वृहत कृषक, परिवार से है।

 

 

 

बेसिन के ग्रामीण निवासित मकानों में महिलाओं का स्वामित्व मात्र 3.55 प्रतिषत पर है तथा 96.45 प्रतिषत मकानों पर अन्य व्यक्तियों का स्वामित्व है। भौगोलिक आधार पर, जहंा मकानों पर महिलाओं का सर्वाधिक स्वामित्व पहाड़ी एवं आदिवासी विकासखण्ड डौंडी (12.90 प्रतिषत) में है। वहीं मैदानी अधिवासित मकानों पर महिलाओं का स्वामित्व अत्यंत कम है। निम्न आवासीय स्तर की यह दषा उनके निम्न सामाजिक स्तर का प्रतिफल है। जिनमें बड़ा एवं संयुक्त परिवार की बहुलता भी एक कारण रही है। ज्ञात हो कि बेसिन की चयनित परिवारों में 64.78 प्रतिषत परिवार संयुक्त रूप में निवासित है जहां व्यक्तियों की संख्या पांच से अधिक है। उल्लेखनीय है कि बेसिन के चयनित परिवारों में 56.81 प्रतिषत मकानों में पांच से अधिक लोग रहते हंै। इन परिवारों में महिलाओं के साथ-साथ बच्चे एवं जवान कम षिक्षित या अनपढ़ है। ग्रामीण परिवार के प्रत्येक सदस्य का मुख्यतया एक ही सोच होता है कि किसी भी तरह जीविकोपार्जन हेतु आय का स्रोत हो तथापि ये अपने परिवार के आकार को बड़ा कर बैठते है फलतः कार्यरत व्यक्ति कम हो जाते हैं तथापि मासिक आय भी कम होती है इस कारण लोग गरीबी के दौर से गुजरते हंै और अपने बच्चों को अच्छी षिक्षा एवं तालिम नहीं दे पाते हंै। जहां षिक्षा की दषा एवं स्तर दोनों अत्यंत निम्न हो जाती है (रंगा राव, 1984) बेसिन की ग्रामीण महिला परिवारों में भी यहीं दषा मिलती है। अध्ययन हेतु चयनित ग्रामीण कार्यषील महिलाओं में 58.62 प्रतिषत महिलाएं साक्षर हंै। सर्वाधिक साक्षर महिलाएं बालोद विकासखण्ड (78.57 प्रतिषत) एवं सबसे कम बेरला विकासखण्ड (28.40 प्रतिषत) में प्राप्त हुए हैं (सारणी 1)

 

ग्रामीण परिवारों में पोषणकर्ता पुरूष होते है फिर भी परिवार का आर्थिक बोझ उठाने एवं पारिवारिक जीवन स्तर को सुधारने में महिलाएं किसी किसी कार्य में संलग्न हैं। चयनित ग्रामीण कार्यषील महिलाओं में 85.87 प्रतिषत महिलाएं कृषि संबंधी कार्यों में कार्यरत है। वहीं 4.78 प्रतिषत महिलाएं शासकीय नौकरी में अपनी सेवाएं दे रही हैं, जबकि 2.83 प्रतिषत महिलाएं घरेलू उद्योग कार्यों जैसे मनिहारी, बढ़ई, सिलाई, लोहार आदि में संलग्न है। उससे प्राप्त आय से परिवार के भरण पोषण में वित्तीय सहायता प्रदान करती है हालांकि इन कार्याें से ग्रामीण कार्यषील महिलाओं को अधिक आय प्राप्त नहीं होता है फिर भी परिवार के उन्नयन एवं देखरेख के लिए आवष्यमभावी है। ज्ञात हो कि चयनित ग्रामीण कार्यषील महिलाओं में 61.23 प्रतिषत महिलाएं, मासिक आय रूपये 1500/- से कम कार्य के बदले अर्जित करती है वहीं मात्र 38.77 प्रतिषत महिलाओं की आमदनी रूपये 1500/-प्रतिमाह से अधिक है। इस प्रकार बेसिन की ग्रामीण कार्यषील महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर है जिसका प्रभाव उनकी आवासीय स्थिति एवं स्वास्थ्य दषाओं पर स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

ग्रामीण कार्यषील महिलाओं में आवासीय दषाएँ

बेसिन के ग्रामीण परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उनके आवासीय दषाएँ भी निम्नस्तर की है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव परिवारों के जीवन स्तर पर दिखाई देता है। बेसिन की आवासीय दषा के निर्धारण मंे मकान का प्रकार, कमरों की संख्या, छत एवं फर्ष का प्रकार, घर निर्माण में प्रयुक्त होने वाली सामाग्री, शौचालय की सुविधा, पेयजल के साधन, बिजली की सुविधा आदि महत्वपूर्ण मानक इकाई है जिनका पृथक-पृथक विष्लेषण किया गया है।

 

 

बेसिन के चयनित परिवारों में मात्र 25.07 प्रतिषत मकान पक्के है। वहीं 74.93 प्रतिषत ग्रामीण मकाने कच्चे एवं अर्धपक्के है जहां आवष्यक आवासीय सुविधाआंे का सर्वथा आभाव रहता है। इन मकानों की दीवारें मिट्टी के बने हैं। तथा छत, घासफूस या खपरैल (73.33 प्रतिशत) से निर्मित है। मकानों में फर्ष, मिट्टी से आच्छादित है जहां सदैव नमी विद्यमान रहती है। ये सदैव जीर्ण अवस्था में मिलते हैं। ये मकान कहीं विरल, कहीं सटे हुए एवं अव्यवस्थित बसे हुए हैं। मकाने एक या दो कमरे वाले है। ज्ञात हो बेसिन की ग्रामीण परिवारों में 46.81 प्रतिषत परिवार एक या दो कमरे वाले मकानों में निवास करते हैं जिसमें 5 से अधिक व्यक्ति एक साथ रहते है। ये आश्रय स्थल छोटे आकार के है। उल्लेखनीय है कि बेसिन की 82.97 प्रतिषत मकानों का क्षेत्रफल एक हजार वर्गफीट से कम है। जबकि मात्र 17.03 प्रतिषत मकानों का क्षेत्रफल एक हजार वर्गफीट से अधिक है। अध्ययन से ज्ञात हुआ कि क्षेत्रफल एवं जनसंख्या के अनुपात में  65.43 प्रतिशत परिवार भीड़युक्त वातावरण में रहते है। इन कम क्षेत्रफल पर बने मकानों की छतें अधिक ऊँची नहीं है। फलतः इन मकानों में रोषनदान एवं खिड़की का अभाव है जिससे दम घोंटू वातावरण हमेषा बना रहता है। विदीत हो कि चयनित ग्रामीण परिवारों में 66.01 प्रतिषत मकान रोषनदान विहीन है (सारणी क्रमांक 2)

 

भारत गाँवों का देष है। देष का जीवन ग्रामीण बस्तियों में है। लेकिन ग्रामीण बस्तियों के निवासियों को न्यूनतम आवासीय सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पाई है जहां अभी तक स्वस्थ्य जीवन जीने हेतु आवष्यक सुविधाओं का पर्याप्त आभाव है जिससे लोगों का जीवन नरकीय हो गया है। अध्ययन क्षेत्र में आवष्यक ग्रामीण आवासीय सुविधाओं की अपर्याप्तता का अनुमान सारणी 2 से स्पष्ट लगाया जा सकता है। महत्वपूर्ण आवष्यक सुविधाओं में शौचालय, स्नानागार, पेयजल की सुविधाओं सर्वाधिक कष्टकर है। चयनित ग्रामीण परिवारों में सबसे बड़ी समस्या शौचालय की है। ज्ञात हो कि बेसिन की ग्रामीण परिवारों में मात्र 19.21 प्रतिषत मकानों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध है जबकि 80.79 प्रतिषत परिवारों के पास शौचालय का अभाव है। ग्रामीण परिवारांे में शौचालय के अभाव में सुबह-षाम शौचदि हेतु खुले में महिलाओं, पुरूषों एवं बच्चों की कतारे सड़क के किनारे लगने लगती है। इनका सबसे अधिक प्रभाव ग्रामीण महिलाओं पर पड़ता है क्योंकि इससे महिलाओं की मान-मर्यादा, इज्जत, सामाजिकता आदि खतरे में जाती है तथा विभिन्न प्रकार की सामाजिक कुरीतियां जन्म लेने लगती है जो ग्रामीण जीवन का उपहास उड़ाती हुई प्रतीत होती है। शायद यहीं ग्रामीण निवासियों का वास्तविक जीवन-दर्षन है। भौगोलिक आधार पर सर्वाधिक शौचालय सुविधाहीन परिवार डौंडी विकासखण्ड में (96.77 प्रतिशत) निवासित है, जबकि सबसे अधिक शौचालय सुविधा संपन्न बालोद विकासखण्ड (45.92 प्रतिशत) के निवासी है। शौचालय सुविधा का यह प्रादेषिक विषमता उनके क्षेत्रीय आर्थिक विपन्नता का प्रतिफल है।

 

बेसिन के 42.83 प्रतिषत महिला परिवारों में रसोईघर की सुविधा है जबकि 57.17 प्रतिषत महिला परिवरों में रसोईघर की सुविधाओं से वंचित है। प्रादेषिक आधार पर रसोईघर की सुविधा से वंचित महिलाओं का सर्वाधिक प्रतिशत नवागढ़ विकासखण्ड (68.75 प्रतिशत) में एवं सबसे कम बालोद विकासखण्ड (39.79 प्रतिशत) में दृष्टव्य हुआ है। ग्रामीण परिवारों की दूसरी सबसे बड़ी समस्या स्नानागार की कमी का है। विदीत हो कि बेसिन के मात्र 13.62 प्रतिषत परिवारों के पास स्नानागार की सुविधा है वहीं 86.38 प्रतिषत परिवारों के पास स्नानागार का आभाव है। प्रादेषिक स्तर पर स्नानागार सुविधा से वंचित महिलाओं का सर्वाधिक प्रतिषत डौंडी विकासखण्ड (96.77 प्रतिशत) में एवं सबसे कम दुर्ग विकासखण्ड (67.29 प्रतिशत) में प्रदर्षित हुई है। इसी तरह बेसिन के 30 प्रतिषत ग्रामीण परिवारों के पास आँगन या बरामदा की सुविधा है, जबकि 70 प्रतिशत परिवरों के पास आंगन या बरामदा का आभाव है। बेसिन में जहां 7.88 प्रतिषत परिवारों के पास निजी पेयजल के साधन की सुविधा है। वहीं 93.12 प्रतिषत परिवारों के पास निजी पेयजल के साधन का आभाव है।

 

इसी तरह 45.14 प्रतिषत निवासियों के घर में दूषित जल निकासी की व्यवस्था है जबकि 54.86 प्रतिषत निवासियों के घर में इस सुविधा से वंचित है। गांव में गंदे नाली की व्यवस्था समुचित रूप से नहीं होने के कारण ग्रामीण परिवार घर के पानी का आंगन के सामने या बाड़ी में खुला छोड़ देते हैं जहां पानी सड़ता रहता है जिससे कीड़े-मकोड़ें एवं मच्छर आदि पनपते हैं तथा हमेषा दुर्गन्ध भी आती रहती है। पाक क्रिया में प्रदूषण मुक्त ईंधन एवं बिजली की कमी के कारण यहां के 90.79 प्रतिषत परिवार कृषियेत्तर पदार्थ लकड़ी या उपला का उपयोग करते हैं जिसके धुएँ से घर का वातावरण प्रदूषण युक्त रहता है। इन सबका सबसे ज्यादा प्रभाव महिलाओं के सामाजिकता पर पड़ती है जिससे उनका स्वास्थ्य एवं जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती ळें

 

निम्न आवासीय दषाओं का कार्यषील महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रभाव:

निम्न स्तरीय आवासीय दषाओं का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्र में निवास करने वाले व्यक्तियों, विषेषकर महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इस अपकर्षित एवं प्रतिवेषीय आवासीय दषाओं का प्रभाव केवल महिलाओं का स्वास्थ्य प्रभावित होता है बल्कि उनके कार्यक्षमता, प्रजननता, बच्चों का पालन पोषण, मानसिक अषांति, व्यक्तित्व एवं सामाजिक प्रतिष्ठा पर भी प्रभावित होती है यहीं नहीं बाल अपराध एवं अन्य सामाजिक बुराईयों के साथ दुःस्वास्थ्य को भी जन्म देती है। ग्रामीण बस्तियों में छोटे क्षेत्रफल एवं एक या दो कमरे वाले मकानों में अनुपात से अधिक लोग रहने से एकान्तता का आभाव एवं भीड़ का वातावरण निर्मित हो जाता है। फलतः कई प्रकार के सामाजिक विकार उत्पन्न होते है, जिसका सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं के व्यक्तित्व एवं स्वास्थ्य पर पड़ता है। अत्यधिक भीड़ एवं एकान्तता के कारण महिलाओं में भावनात्मक एवं मानसिक अषान्ति उत्पन्न हो जाती है और रोगग्रस्त हो जाते है।

 

बेसिन के ग्रामीण क्षेत्र में 73.33 प्रतिषत परिवारों के मकान का छत, खपरैल या छप्पर के बने है तथा फर्ष मिट्टी के है जो वर्षाकाल में पानी के टपकने या पानी के सीधे मिट्टी के फर्ष में पड़ने से नमी एवं शीलन का प्रभाव रहता है इससे सिर्फ महिलाओं एवं बच्चों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है बल्कि वे सदैव सर्दी-खासी एवं बुखार जैसे बीमारी से ग्रसित रहते हंै। इसका प्रभाव उसकी कार्यषीलता एवं दक्षता पर पड़ता है फलतः ग्रामीण विकास में उनकी भूमिका क्षीण हो जाती है। इसी तरह ग्रामीण परिवारों के पाक क्रिया में परम्परागत प्रदूषण युक्त ईंधनों जैसे कृषि अवषिष्ट पदार्थ, लकड़ी या उपला का अधिक प्रयोग किया जाता है जिसके उत्पन्न धुएँ से महिलाओं को विभिन्न रोगों से ग्रसित होना पड़ता है।

 

ग्रामीण क्षेत्र के अन्य निकर्षित एवं निम्न आवासीय दषाओं में रोषनदान की कमी एवं खिड़की का अभाव, प्रकाष एवं धूप का अभाव, पानी का जमाव, गृह के समीप कूड़ा-कचरा का जमाव, नाली का अभाव, गंदे नाली निकास का अभाव एवं दुर्गंधयुक्त गंदी नाली का होना आदि का निष्चित रूप से उनमें निवास करने वाले लोगों विषेष कर ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है। यहीं नहीं आवष्यक आवासीय सुविधाओं जैसे-षौचालय, स्नानगृह, रसोईघर, शोधित पेयजल, बिजली आदि का होना या उनकी अपर्याप्तता निष्चित रूप से वहां के निवासियों विशेष कर महिलाओं के स्वास्थ्य पर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। निजी शौचालय के होने से ग्रामीण  महिलाओं को सबसे अधिक कष्ट उठाना पड़ता है क्योंकि उन्हें शौच हेतु प्रातःकाल से पूर्व ही अंधेरे में समीप के खुले भागों या सड़क किनारे जाना पड़ता है। बेसिन के 86.38 प्रतिषत ग्रामीण परिवारों में स्नानगृह का अभाव है इसका भी सबसे अधिक प्रभाव महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है क्योंकि महिलाएं घर से बाहर खुले स्थान जैसे-तालाब, कुआँ, हेण्डपम्प के पास स्नान करने जाती है जिससे अतिषीघ्र स्नान कर, गीला कपड़े लपेटे, अस्वच्छ ही घर लौट आती है। इससे सिर्फ उनका स्वास्थ्य प्रभावित होता है बल्कि मान-मर्यादा, लज्जा तथा उनकी व्यक्तित्व पर भी गहरा आघात पहुंचता है। ऐसी एक अन्य समस्या शुद्ध पेयजल की प्राप्ति का है, क्योंकि गांव में जल शोधनषाला का अभाव होता है। फलतः ग्रामीण महिलाएं दैनिक उपभोग के जल प्राप्ति के लिए गलियों में दूर तक कुआं, हेण्डपम्प या नलकूप के पानी के लिए दौड़ लगाती है। कभी-कभी घंटों पानी प्राप्ति हेतु लाइन में खड़ा होना पड़ता है। इससे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों ही रूप से उनके स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। थकान, कमजोरी, अनिद्रा एवं अन्य छोटे एवं दीर्घावधि बीमारियों से ग्रसित हो जाती है।

 

ग्रामीण क्षेत्र का सबसे बड़ा स्वास्थ्य संकट, मकानों से निकलने वाले मल, गोबर, गंदे पानी तथा कूड़े-करकट के निस्तारण की उपयुक्त व्यवस्था का आभाव है। निस्तारण के अभाव में मल, गोबर, गंदे पानी एवं कूड़ा-कचरा को घर के आंगन में या आस-पास या फिर इधर-उधर कहीं भी फेक देते हैं, जो प्रदूषण, गंदगी, बदबू तथा उनसे उत्पन्न बिमारियों के घनत्व को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

 

सुझाव:

मानव की तीन मूलभूत आवश्यकता रोटी, कपड़ा एवं मकान है। वर्तमान समय में मकान सबसे महत्वपूर्ण आवश्कता रह गई। देश के नागरिकों को आवश्यक सुविधा युक्त आवास उपलब्ध कराना एक गंभीर समस्या एवं चुनौती है। भारत एवं छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार के योजनाएं संचालित कर इन समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। आवास संबंधी योजना के माध्यम से हर परिवारों को पक्के मकान उपलब्ध कराने के लिए शासन द्वारा महत्वकांक्षी परियोजना सबके लिए आवास-2022, संचालित किए जा रहा है। प्रधानमंत्री अटल आवास योजना के अंतर्गत गरीबों को रसोई-युक्त मकान लगातार उपलब्ध कराया जा रहा है। स्वच्छ भारत की दिशा में स्वच्छ भारत मिषन योजना के अंतर्गत ग्रामीण एवं शहरी दोनों क्षेत्र के गरीबों को घर-घर शौचालय का निर्माण कराया जा रहा है। स्नानागार के लिए नदी-नालों एवं तालाबों में पचरी एवं बंद दीवाल का निर्माण कार्य लगातार जारी है। प्रधानमंत्री सौभाग्य योजना के माध्यम से घर-घर बिजली पहुंचाई जा रही है। प्रदूषण मुक्त रसोई सुविधा उपलब्ध कराने हेतु उज्जवला योजना का क्रियान्वयन पूरे देष में की गई है। इसके अंतर्गत महिलाओं को निःषुल्क गैस कनेक्षन उपलब्ध कराएं जा रहे हंें

 

निष्कर्ष:

बेसिन में निम्न स्तरीय एवं दयनीय आवासीय दषाओं एवं आवष्यक आवासीय सुविधाओं के अभाव से परिवार के अन्य सदस्यों की स्वास्थ्य तुलना में ग्रामीण महिलाओं विषेषकर कार्यषील महिलाओं के स्वास्थ्य अधिक प्रभावित हुई है क्योंकि कार्यषील महिलाओं को पूरे दिन के अधिकांष समय घर में ही रहकर व्यतीत करना पड़ता है। महिलाओं को अत्यधिक भीड़युक्त कमरों में रात्रि में श्यन से लेकर भोजन पकाना एवं अन्य घरेलू कार्यों को घर में रहकर करना पड़ता है। इस निम्न आवासीय दषाओं से सिर्फ, उनके स्वास्थ्य स्तर प्रभावित हुई बल्कि उनकी व्यक्तित्व, सामाजिकता एवं जीवन की गुणवत्तता भी प्रभावित हुई, जो बेसिन के ग्रामीण परिवारों के निम्न आर्थिक स्तर का प्रतिफल है।

 

संदर्भ-सूची:

1ण्    चैबे, कैलाष (2001) स्वास्थ्य/चिकित्सा भूगोल, मध्यप्रदेष हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल, पृ. 23

2ण्    राजपूत, प्रेम प्रकाष एवं श्रीवास्तव, रमेष चंद्र (2003) निम्न स्तरीय आवासीय सुविधाओं से वंचन महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रभावः दिठियापुर की मलिन बस्तियों का एक प्रतीक अध्ययन, उत्तर भारत भौगोलिक पत्रिका, अंक 9, पृ. 68-78

3ण्    सिंह, वीणापाणि (1998) ग्रामीण स्वास्थ्य संरक्षण, क्लासिकल पब्लिषिंग कम्पनी, नई दिल्ली, पृ. 72

4ण्    वर्मा, सुनीता एवं ओंकार प्रसाद (2008) विकासखण्ड सेवापुरी में जनसंख्या और अधिवास का भौगोलिक अध्ययन, उत्तर भारत भूगोल पत्रिका, अंक 38, संख्या 3, पृ. 35-39

5ण्    वर्मा, रमेष कुमार (2014) वाराणसी नगर में जनसंख्या तथा आवास वृद्धि एवं स्वास्थ्य सुविधाएँ, राष्ट्रीय भौगोलिक पत्रिका, वर्ष 5, अंक 1, पृ. 93-108

6ण्    ैपदहीए ।इीं स्ंोीउप ;2005द्धरू त्नतंस ॅवउमद ॅवता - भ्मंसजीए ज्ीम ॅवउमद च्तमेेए छमू क्मसीपए चच 32.34ण्  

7ण्    ैपदहीए ठपदवक ज्ञनउंतए त्ंेीउप ंदक त्ंउ ठपसंे ;2013द्धरू भ्वनेपदह ब्वदकपजपवदेए भ्वनेपदह ैजवबो ंदक भ्वनेपदह ैीवतजंहम पद न्जजंत च्तंकमेीरू ।द प्दजमत क्पेजतपबज ।दंसलेपेए छंजपवदंस ळमवहतंचीपबंस श्रवनतदंस िप्दकपंए टवसण् 59 च्ज ;1द्धए चचण् 31.52ण्

8ण्    ैपदहीए ।इीं स्ंोीउप ंदक ठंसंए ैींदंूं्र ।ीउंक ;2015द्धरू भ्मंसजी प्उचसपबंजपवदे िच्ववत भ्वनेपदह ब्वदकपजपवदे पद ैतपदंहंत ब्पजलए ।ददंसेए छंहपए टवसनउम.ग्ग्ग्ट ;छवण्1द्धए चचण् 11.25ण्

9ण्    ैपदहीए ।इीं स्ंोीउप ंदक  ।ेहीमतए डकण् ैंतंितं्रए ;2005द्धरू त्नतंस ॅवउमदष्े भ्वनेमीवसक ॅवता ंदक भ्मंसजीरू ब्ंेम ैजनकलए ज्तंदेंबजपवदए टवसण् 29 छवण् 1 चचण् 83.94ण्  

10ण्   वमससवए क्ण् ;2007द्धण् म्उचवूमतपदह ॅवउमद ज्ीतवनही प्ब्ज्रू म्दींदबपदह ।बबमेे जव प्दवितउंजपवद इल त्नतंस ॅवउमदण् ीजजचध्ध्ूूूण्हवअउवदपजवतण्बवउध्दवकमध्1454ण् ।बबमेेमक थ्मइतनंतल 2दकए 2009ण्

 

 

 

 

 

 

Received on 09.03.2019            Modified on 16.04.2019

Accepted on 18.05.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(3):687-694.